Wednesday, December 17, 2008

...और जहां हर मन्नतें पूरी हो

-थावे वाली माई की महिमा

वैश्विक युग में भौतिकता को छोड़ कर जीवन को एकदम नये मिशन पर लगा देना, अपने आप में एक अद्ïभुत काम है। आधुनिक तकनीक को समझ-बूझ कर इसका उपयोग परिवार, गांव, संस्कृति और समाज को जोडऩे एकसूत्र में पिरोने के लिए कैसे किया जाए, दुनिया से कैसे तालमेल बैठाया जाए। इसी सोच को लेकर एक सधारण कद-काठी और सहज जीवन जीने वाले नौजवान ने पिछले कई वर्षों से अपने जीवन को होम कर रखा है। उस आदमी का नाम है, अजित तिवारी. आज जिस तरह से बाजार की तलाश में पश्चिमी देशों की नजर भारत की हर एक चीज पर है. उसमें अगर भारत की व्यवस्था के हर एक चीज को ऊपर उठाने के लिए दुनिया के साथ कदम से कदम मिला कर अपनी चीजों को आगे बढ़ाने के लिए अगर अजित तिवारी जैसा नौजवान कमर कस ले, तो मेरा मानना है कि हम फिर दुनिया के सिरमौर बन सकते हैं. देश अगर आज किसी चीज पर गर्व महसूस कर रहा है, तो वह है भारतीय की पारंपरिक व्यवस्था. दुनिया को भारत की इस सामाजिक पारंपरिक व्यवस्था से परिचित कराने का बीड़ा उठाया है अजित तिवारी ने. इस व्यवस्था की छोटी सी पहल ये वेबसाइट के माध्यम से कर रहे हैं. इनके साइट का नाम है http://www.jaimaathawewali.com इन्होंने इस पर बिहार के गोपालगंज जिले की पावन धरती थावे और थावे वाली भवानी की विस्तार से चर्चा किया है।

आइये, हम भी देखें और आप भी...

माई दुर्गा तिनु लोक में सर्वशक्तिमान हई, ब्रहमांड में मौजूद हर तरह के शक्ति माई के कृपा से ही मिलेला आवुर अंत में सारा शक्ति इनके में विलीन हो जाला एही से माई दुर्गा के आदिशक्ती भी कहल जाला देवता लोग भी जब राक्षसन से लडाई करत में अपना के कमजोर महसूस करे लागल तब माई दुर्गा के शरण में गईल लोग, माई प्रचंड रूप धारण करके राक्षस सब के संहार कईली आ धर्म के रक्षा कईली माई के अनके रूप और नाम बा, समय-समय पर माई अलग-अलग रूप अलग-अलग नाम से अवतार लेले बाड़ी और अधर्म ke नाश कइले बाड़ी माई के एही सब अनेक रूप-नाम में से एगो थावेवाली माई भी हई
थावेवाली माई असम का कामरूप से, जहवाँ कामख्या देवी के बड़ा प्राचीन आ भव्य मंदिर बा, थावे अईली एह से माई के कावरू-कामख्या देवी के नाम से भी जानल जाला थावे में रहषु जी माई कामख्या के एगो सच्चा भक्त रहनी बाकिर ओघरी के थावे के राजा मनन सिंह का एह बात में विश्वास ना रहे आ ऊ रहषु भगत जी के ढोंगी समझत रहलन एक दिन राजा मनन सिंह अपना जिद्द पर अड़ गईलन आ रहषु भगत जी के चुनौती दिहलन कि अगर तू देवी के असली भगत होखबऽ त अबहियें देवी के बोलाके देखावऽ, ना त तोहरा के दंड दिहल जाई. रहषु जी के बार-बार समुझवलो पर राजा मनन सिंह ना मनले, तब रहषु जी का लगे माई के बोलवला का अलावा दोसर कवनो राह ना रहे रहषु जी माई के सुमिरन कईनी, माई कामाख्या स्थान से चलली आ कलकाता , पटना, आमी होत थावे अईली आ साक्षात दर्शन दिहली. राजा मनन सिंह के राज-पाट सहित अंत हो गईल
माई जहाँ दर्शन देहली ओहिजे उहाँ के मन्दिर बनावल गईल. रहषुओ भगत के मन्दिर ओहिजे लगले बा. बगले में राजा मनन सिंह के महल के खँडहरो बा कहल जाला कि माई का दर्शन के बाद रहषुओजी के भी दर्शन करे के चाहीं, तबे माई खुश होखेली
माई बहुत दयालु आ कृपालु हई अपना शरण में आइल सभकर कल्याण करेली हर सुख-दुख में लोग माई का शरण में जाला आ माई केहूओ के निराश ना करेली सभकर मनोकामना पूरा करेली थावे में केहू का घरे शादी-बियाह होखे तबो लोग माई के आशीर्वाद लेबे जाला, कवनो दुःख-बेमारी होखे तबो लोग मई के शरण में जाला, केहू का कवनो गाड़ी-घोड़ा किनाला ता पहिला पूजा माईए कीहाँ होला माई हर घड़ी आ हर सुखदुख में अपना भगतन पर करुणा आ ममता के छाँह राखेली, सभकर मंगल करेली
देशो-विदेश में रहेवाला लोग जब साल-दूसाल पर अपना घरे आवेला तब ऊ थावेवाली माई के दर्शन करे जरुर आवेला बाकिर अफ़सोस एह बात के बा की अतना महत्व का बावजूद एह स्थान के सम्यक विकास नइखे भईल आम जनता आ प्रशासन के मिलजुल के एह स्थान के समुचित विकास के कोशिश करे के चाहीं जेहसे कि माई के स्थान विश्व का मानचित्र पर एगो महत्बपूर्ण दर्शनिय जगह बन जावे.
माई के महिमा के विश्व भर में प्रचार-प्रसार करे खातिर एगो वेबसाइट www.jaimaathawewali.com भी बनवाल गईल बा जवना से विश्व के कवनो कोना से इन्टरनेट में माध्यम से माई के बारे में पुरा जानकारी लेहल जा सकेला एह वेबसाईट पर जाके माई के कथा, कईसे पहुँची माई के दरबार में, माई के आरती-स्तुति, साल के व्रत-त्यौहार वगैरह बहुत जानकारी लेहल जा सकेला माई के फोटो देखल जा सकेला और भजन-कीर्तन के आंनंद भी लेहल जा सकेला रउरा एह विषय पर अतिथि पुस्तिका में आपन विचार भी व्यक्त कर सकिले
थावे के एगो मिठाई बड़ा प्रसिद्ध हां जवना के पिडुकिया कहल जाला, शुद्ध देशी घीव में बनेवाला ई मिठाई असली सवाद में ओहिजे मिलेला कबो थावे माई के दरशन करें आईं त पिडुकिया खाईल मत भुलाईं
जय थावेवाली माई के !
अजीत कुमार तिवारी

www.jaimaathawewali.com

Thursday, November 27, 2008

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स्वयं प्रकाश: मेरे हिस्से का सच-1

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ऐसे तो स्वयं प्रकाश भइया के बारे में मेरे लिए कुछ भी लिखना दुस्साहस का काम है, इसलिए भी कि जब वे सामने होते हैं, तो मैं मूक हो जाता हूं। लगता है जैसे मैं कुछ हूं ही नहीं। लेकिन उसके बाद भी खुद को रोक न सका और उनसे जुड़े अपने कुछ संस्मरणों को कागज पर उकेरने की गुस्ताखी कर बैठा।

-जय प्रकाश -

एक अदृश्य विचार की रेखाएं मेरे माथे में चल रही थी और मेरे इस तसव्वुर में उनके माथे पर चिंतन की सलवटे पड़ रही थी। जी, मैं बात कर रहा हूं अपने स्वयं प्रकाश भइया की। लेकिन आज के स्वयं प्रकाश की नहीं, जो मेरे हर दिल अजीज बड़े भाई बन चुके हैं। मैं बात कर रहा हूं उस स्वयं प्रकाश की, जिन्हें मैं नहीं जानता, लेकिन आज उन्हें देखकर ऐसा लगता है कि जरूर वो ऐसे ही रहे होंगे, ऐसे ही सोचते होंगे, ऐसे ही, ऐसे ही, ऐसे ही..... न जाने कितने ऐसे ही हैं मेरे जेहन में, जो मुझे परेशान भी करते हैं और सुकून भी पहुंचाते हैं, क्योंकि इन ऐसे ही में मेरे स्वयं प्रकाश भइया की यादें तो जुड़ी रहती है, न। शायद कपोल-कल्पित और शायद नहीं. क्योंकि मेरे हिस्से का तो सच यही है.

माथे पर चिंतन की सलवटे लिए स्वंय प्रकाश भइया जब अपनी हाथ में कलम लिए दिमाग को ठकठकाते हुए कोरे कागज पर शब्दों को बार-बार उकेर रहे होगें, तो शुरू में उन्हें भी खुद पर अविश्वास हुआ होगा। बहुत कठिन लगा होगा कि इस विशाल व्यक्तित्व को कैसे कोरे कागज में समेटूं। और शायद उनका वही चिंतन आज के इस ब्रह्मïनाद के कार्यक्रम में उभर कर सामने आ गया। ये मेरी कल्पना है।

1200 सितार वादकों के मधुर तान से आसमान गूंज रहा था। पवित्र यमुना, देशी-विदेशी पक्षियां, सूर्यास्त की लालिमा और देश-विदेश से आए लोग आध्यात्मिक गुरु श्रीश्री रवि शंकर का स्वागत कर रहे थे। कार्यक्रम था ब्रह्मïनाद का. रचा जा रहा था इतिहास. धुन का, सुर का, संगीत का, अनुशासन का और गाए जा रहे थे जीवन के गीत. जगह था नोएडा के सेक्टर -32 का मैदान. इस इतिहास के गवाह बने मेरे जैसे लाखोंं जिज्ञासु. मेरे अंदर सुबह से दो बातों को लेकर कोलाहल मची हुई थी. पहला यह कि इस विहंगम दृश्य का साक्षी बनने को लेकर और दूसरा ये कि स्वयं प्रकाश भइया की किताब जीना सिखा दिया- श्री श्री रवि शंकर- एक जीवनी- के लोकार्पण को लेकर. और, मैं साक्षी बना. ब्रह्मïनाद में पहुंचने के बाद मैं न तो कुछ सोच पा रहा था और न हीं समझ पा रहा था. मैं अपने दायित्वों को निपटा कर सुर-संगीत के संगम में मगन हो गया. मेरे जीवन का यह पहला अवसर था जब मैंने अथाह 'सागरÓ जैसी हिलोरें मारते जनसैलाब को देखा, जो आने वाले क्षण को संजो लेना चाहते थे अपनी आंखों में- और मैं भी, जो चाहता था कि अपने नयन रूपी कंवल को खाली कर लूं, क्योंकि अमृत की बारिश तो अब होने वाली थी- यानी श्री श्री रवि शंकर की जीवनी पर आधारित किताब का लोकार्पण. और यह क्षण मेरे लिए ठीक वैसा ही था-जैसा कि विदेह नगर में श्रीरामचंद्र जी के पधारने से पहले ही सीताजी की सखियां भाव-विभोर हो कर आंसुओं की बारिश कर रही थीं, जिस पर गोस्वामी तुलसीदास जी ने ये पंक्तियां लिखी थी-

सांवर रूप सुधा धरिवे को

नयन कंवल कल कलश रितौरी

मंच से जब-जब उदï्घोषणा होती, मेरी धडक़नें बढऩे लगती. जगह की कमी के कारण मैं और अनुराग भइया (वरिष्ठï पत्रकार) एक ही कुर्सी पर बैठे थे। रात के 8:30 बज रहे होंगे, जब सितारों का बजना शांत हुआ. मंच से आवाज आई - दो साल पहले जब दैनिक भाष्कर के संपादक श्री स्वयं प्रकाश जी आर्ट ऑफ लिविंग के सिल्वर जुवली कार्यक्रम बंगलूर में... हजारों लोगों के बीच मंच पर स्वयं प्रकाश भैया को देखकर एकाएक मेरी आंखों से आंसू छलक गये. मैं खुद को रोक नहीं पाया. क्यों, मुझे मालूम नहीं! हां, इस वक्त सामने खड़ा वही शख्स, मेरी तसव्वुर में भी था. आंखें भी उन्हीं को देख रही थी और भीतर की आवाज भी उन्हीं को सुन रही थी- उनकी यह बात जो अक्सरहां मुझसे कहा करते थे- बाबू! भावनाओं की कोई भाषा नहीं होती. मेरे दिमाग को यह बात बार-बार झकझोर रही थी.

सनï् 2005 की बात रही होगी. मैं स्नातक के बाद पत्रकारिता को जानने-समझने के लिए दिल्ली चला आया. प्रभात खबर के कार्यालय में मेरी मुलाकात अंजनी कुमार सिंह (अब प्रभात खबर के दिल्ली ब्यूरो प्रमुख) से हुई. वे मुझे छोटे भाई जैसा मानते हैं. चर्चा के दौरान स्वयं प्रकाश भइया के बारे में बताया और उनका नम्बर दिया. लेकिन हमने इसे बहुत हल्के में लिया और बात नहीं की, पर संयोगवश मैं जहां भी जाता था, उनकी बात निकल ही आती थी. और, अब मुझे उनसे न मिलने का मलाल भी होने लगा.मैं दिल्ली से वापस अपने गांव चला आया. उसके कुछ दिनों बाद 'हिन्दी दैनिक आजÓ पटना में काम करने का अवसर मिला. आज अखबार में कुमार निशांत जी (वर्तमान में छिंदवाडा में कार्यकारी संपादक) से मित्रता हुई। पर कुमार निशांत जी कुछ दिन में मेरे बड़े भाई बन गये। एक रोज मै निशांत भइया से स्वयं प्रकाश जी कि चर्चा की और बड़े चाव से उनको ये बताया कि ये दैनिक भाष्कर के संपादक हैं. उसके बाद निशांत भइया कुछ चिढ़ाने वाले अंदाज में बड़े अपनेपन से हमेशा हमसे पूछने लगे- तब होऽ जेपी तोहार दैनिक भाष्कर के संपादक स्वंय प्रकाश जी के का हाल बा. जबकि मैं हर बातचीत में ये बताया करता था- उन्हें जानता नहीं, लेकिन उनके बारे में सुन बहुत रखा है.

उसी दरमियान हम और निशांत भैया दोनों नौकरी छोड़ कर दिल्ली चले आये. हम दोनों दिल्ली का चक्कर काटते रहते थे. मैं दिल्ली का रास्ता बताता और निशांत भइया जगह. रोज की तरह हम लोग 14 अक्टूबर 2007 को आईएनएस के आसपास घूम रहे थे. निशांत भैया बोले जेपी, पालम चलना है और पालम जाने को लेकर जबरदस्त रहस्य बना रखा था. मेरे लाख पूछने पर भी उन्होंने ये नहीं बताया कि किसलिए? वहां पहुंचने पर एक घर में हम लोग गये. वहां निशांत भइया ने कई लोगों के पांव छूए और उनका अनुसरण मैं करता गया. मै भी ठीक उनके-उनके पांव छू लेता, जिनके-जिनके वो छूते जाते. थोड़ी देर में गंजी और पायजामा पहने गोरा-चिट्टïा जवान, मध्यम कदकाठी और अधपके बाल वाले सज्जन वहां हाथ में ढेरो अखबार लेकर अंदर के कमरे से निकल कर आए. निशांत भइया का अनुसरण करते हुए मैंने उनका भी पांव छू लिया. पता चला कि...
जारी...

Monday, October 27, 2008

सारण : कहां गये वो दिन...

जय प्रकाश मिश्र

छपरा को 'सारणÓ के नाम से संबोधित करने से इस बात का बोध होता है कि पुराने छपरा की बात हो रही है, यानी कि छपरा, सीवान और गोपालगंज. सारण जिला था जो सीवान और गोपालगंज अनुमंडल में बंटा हुआ था. सारण की भौगोलिक स्थिति त्रिभुजाकार है, जिसे एक तरफ से गंडक ने और दूसरी तरफ से सरयू ने अपनी शीतलता प्रदान कर रखी है, तो तीसरी तरफ है उत्तर प्रदेश की सीमा. सामाजिक, राजनैतिक और धार्मिक तीनों दृष्टिïकोणों से सारण प्रयोगस्थली के रूप में विख्यात रहा है. अब यह प्रयोगधर्मियों के स्थली में बाहुबली और धनबली अपना प्रभुत्व जमाते जा रहे हैं. इतना ही नहीं यहां अब जातियों के बीच का सद्भाव भी समाप्त होता जा रहा है, जिसके लिए यह कभी मशहूर हुआ करता था.अगर सारण से टूट कर बने तीनों जिलों के तमाम पहलुओं पर ध्यान दिया जाए तो यह स्पष्टï है कि इतिहास में जो इसकी छवि थी, वह अब नहीं रही. सारण में शुरू से ही हर क्षेत्र की प्रतिभा पनपती-उभरती रही है, जिसे उसने अपने गोद में पाला है, जिनसे दुनिया रौशन होती रही है. अपनी संस्कृति की पहचान से इसने दुनिया को चकाचौंध किया है, मगर उसके बाद भी इसका सम्यक विकास नहीं हो पाया और यह वहीं का वहीं रह गया, जहां से अपनी यात्रा शुरू की थी.भोजपुरी के शेक्सपीयर के नाम से लब्ध प्रतिष्ठï भिखारी ठाकुर का जन्म सारण के कुतुबपुर दियारा में हुआ था. कला के क्षेत्र में अपने जलवा का लोहा मनवाने वाले भिखारी ठाकुर का गांव आज भी दियारा की दर्द भरी दास्तान को कह रही है. किसी गांव के नाम में अगर दियारा शब्द लगा दिया जाता है, तो सारण के साथ बिहार के अन्य क्षेत्रों में इसी बात से जाना जाता है कि जीवन की मूलभुत सुविधाओं से महरूम गांव. और यह हालत कुतुबपुर दियारा की है. राजनैतिक क्षेत्र में सारण ने कई नाम दिए. डॉ. राजेन्द्र प्रसाद से लेकर जय प्रकाश नारायण तक का नाम सारण से जुटता रहा है. भारत के प्रथम राष्टï्रपति डॉ. राजेन्द्र बाबू का जन्म सीवान जिले के जीरादेई नामक गांव में हुआ. प्रेरणास्रोत स्थल के रूप में विकसित होने वाले जीरादेई में विकास के नाम पर कुछ नहीं है. कहने के लिए एक उच्च विद्याालय और एक पार्क भी है, लेकिन वह भी खस्ताहाल. राजेन्द्र बाबू के गांव से तीन किलोमीटर की दूरी पर बने एक रेलवे स्टेशन पर सवारी गाडिय़ों को छोड़ कर दूसरी किसी भी गाड़ी का ठहराव नही होता. देश में अपनी प्रतिभा का डंका बजवाने वाले राजेन्द्र बाबू का पैतृक गांव जीरादेई गुमनामी की पीड़ा झेलने को विवश है. वहीं कौमी एकता के प्रतीक मौलाना मजहरूल हक भी सारण की ही देन हैं. इससे सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि जब राजेन्द्र बाबू का पैतृक गांव बदहाल है, तो हक साहब के गांव की मिजाजपुर्सी कौन करेगा. इनके नाम पर छपरा में महज एक एकता भवन है, जो जर्जर है. लोकनायक जयप्रकाश नारायण का गांव सिताब दियारा आज अपने अस्तित्व की बाट जोह रहा है. सिताब दियारा घाघरा नदी के कटाव की चपेट में है. इनके नाम पर छपरा में जयप्रकाश विश्वविद्यालय की स्थापना की गई है. सबसे मजेदार बात सारण से ये जुड़ा है कि प्रतिभा के धनी राजेन्द्र बाबू के गांव से महज दो किलोमीटर की दूरी पर रूइया बंगरा गांव में नटवर लाल का पैतृक गांव है, जिसने पूरी दुनिया को अपनी उंगलियों पर नचा कर रख दिया. यह ठीक है कि उसने अपनी मेधा का इ्रस्तेमाल रचनात्मक काम करने में नहीं किया, लेकिन इससे उसकी प्रतिभा पर सवाल नहीं उठाया जा सकता है. और शायद यही कारण है कि रूइया बंगरा की चर्चा करना कोई नहीं चाहता, लेकिन क्या राजेंद्र प्रसाद और लोकनायक के गांवों को भी उतनी अहमियत दी गई, जितनी की वो हकदार थी. सारण ने बिहार को आधा दर्जन मुख्यमंत्री दिये हैं, जिसमें स्व. महामाया प्रसाद सिन्हा, दारोगा प्रसाद राय, अब्दुल गफूर, राम सुंदर दास, लालू प्रसाद और राबड़ी देवी शामिल हैं. विकास के नाम पर लालू प्र्रसाद यादव और राबड़ी देवी को छोड़ दिया जाए तो किसी के भी पैतृक गांव या चुनावी क्षेत्र में अब तक विकास नही हुआ है. अगर विकास की बात कि जाए तो सीवान में दारोगा राय के नाम पर महाविद्यालय और अब्दुल गफूर के नाम पर कन्या विद्याालय नजर आता है. वहीं विकास के मामले में लालू-राबड़ी के शासनकाल में इनके पैतृक गांव फुलवरिया और ससुराल में धुआंधार विकास हुआ. विकास का पैमाना इसी से लगाया जा सकता है कि लालू की मां मरछिया देवी की प्रतिमा मीरंगज और फुलवारिया में सिर्फ इसलिए स्थापित किया गया है कि उन्होंने लालू जैसे सामाजिक न्याय के पुरोधा को जन्म दिया था. धार्मिक रूप से भी सारण की पहचान अप्रतिम है. भगवान शंकर और विष्णु के अनुयायियों के मिलन स्थल के रूप में हरिहर क्षेत्र सोनपुर, सती स्थल के लिए आमी, सिद्घपीठ के लिए थावे भवानी और इसके साथ ही बौद्घ सम्प्रदाय के लिए भगवान बुद्घ से भावयोगनी का जंगल और हस्तीग्राम (अब हाथीखाल, बथुआ, गोपालगंज) जुड़ा हुआ है. ऐसा कहा जाता है कि गौतम बुद्घ जब कुशीनगर के लिए जा रहे थे तो उनका ठहराव भावयोगनी के जंगल और हस्तीग्राम में हुआ था. हस्तीग्राम में आज भगवान बुद्घ का मंदिर स्थापित है. मगर बिहार में पर्यटन के विकास के लिए बनाये गये बौद्घ सर्किट से इन जगहों को नही जोड़ा गया है. कालांतर में यहां राजनीति में अपराध का खूब बोलबाला रहा है. एक के बाद एक राजनीतिक हत्या एवं वर्चस्व की लड़ाई हुई. इन राजनीतिक हत्याओं में न जाने कितनी लाशें गिरीं. कभी जाति के नाम पर तो कभी जमात के नाम पर, कभी दल के नाम पर कभी चुनाव के नाम पर बंदूकें तनी और जानें गईं. मसरख के अशोक सिंह की हत्या हुई. सीवान में जेएनयू के पूर्व छात्रसंघ के अध्यक्ष चन्द्रशेखर की हत्या हुई. गोपालगंज में अपराध का खूनी खेल खूब खेला गया. दो जातियों के आपसी वर्चस्व की लड़ाई में नगीना राय की जान गई और एक के बाद एक अपराधी पैदा हुए. जिनमें से कई तो ईनामी है और कई पर तो ईनामी राशि पांच लाख रुपये तक की है. बहरहाल, इन तमाम बातों का लब्बोलुआब ये है कि बिहार की भूमि तो काफी उर्वरा है, लेकिन सबका दर्द एक ही है- उपेक्षा.

Wednesday, September 24, 2008


अपना माटी से जोड़े के एगो प्रयास बा