अपना
माटी से जोड़े के एगो प्रयास बाWednesday, September 24, 2008
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"माटी" जड़ से जुड़ना सिखाती है... दूर जाने के बाद भी "आपन माटी" याद आती है...
मानव सभ्यता के विकास के साथ ही मानवीय गुणों का भी विकास हुआ. इंसान अपनी माटी से जुड़ कर रहने का गुर सिखा. इसी गुर को भारत ने अपनाया और दुनिया का 'सिरमौर' बन गया. एक बार फ़िर से सिरमौर बनाने के सपने को साकार किया जा सकता है. इस दिशा में एक छोटा सा संकल्प"आपन माटी" की तरफ लौटने का प्रयास. आइये इस प्रयास को परिणाम तक पहुँचने में आप भीभागीदार बनिए.
8 comments:
JaiPrakash babu tuhar i pryas bahute sarahniya ba. aage badhat raha ehe gmar kamna ba.
Sadasiv Tripathi
परम्परा और संस्कृति की गहरी समझ आपन माटी की अन्यतम विशेषता है. मुझे पुरा विश्वास है यह ब्लॉग देश और प्रदेश के लोगों को माटी से जुड़ने की कला सिखायेगा. अनंत शुभकामनाओं के साथ यही आकांक्षा है कि प्रतिपल पत्थर होते इस विश्व में हमारी मिटटी की खूशबू यूँ हीं महकती रहे.
निमेष शुक्ला
दिल्ली
Hey Jaiprakash!
tahar e prayas bahut sarahniya ba.
hamara bahut achachha lagal.
aage raura se yahi kamana ba ki aise hi prayas chahi sab logo ke aapan mati se jodne ke.
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Regards.
Nirmal Kumar
Jai Prakash Jee
Raur eeprayas bahut sarahaniye baate, aa apna maatee ke asali khusabi ruara lekhani me bhi baa, raura yeh prayas se jaroor log ka apna maatee se judal rahe me madad mili, aa raur prayas safal hoi
hamar shubhkamna hamesa raura sathe baa
.......
Ajit Tiwari
www.jaimaathawewali.com
Hi Jaiprakash Ji
Bahut bahut achcha likhle bani.
E baat sayad bahut kam log ke pata ba.
Thanks
Rakesh pandey
जली को आग कहतें हैं
बुझी को राख कहतें हैं
उससे जो बारुद बनता हैं
उसको जयप्रकाश कहतें हैं.
साधुवाद
आपके ब्लॉग की विषय वास्तु बड़ी सार गर्भिक है.ये उन पहलूवों को समाहित करती है जहाँ मेरी पहुँच सोच में है पर लेखनी नहीं ले पाया वहां तक.
मैं श्रृंगार रस और सामाजिक विषय पे लिखता हूँ, अपने पास उपलब्ध अल्प समय में.बहुत अच्छा प्रयास है.जरी रखिये !
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