Thursday, November 27, 2008

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स्वयं प्रकाश: मेरे हिस्से का सच-1

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ऐसे तो स्वयं प्रकाश भइया के बारे में मेरे लिए कुछ भी लिखना दुस्साहस का काम है, इसलिए भी कि जब वे सामने होते हैं, तो मैं मूक हो जाता हूं। लगता है जैसे मैं कुछ हूं ही नहीं। लेकिन उसके बाद भी खुद को रोक न सका और उनसे जुड़े अपने कुछ संस्मरणों को कागज पर उकेरने की गुस्ताखी कर बैठा।

-जय प्रकाश -

एक अदृश्य विचार की रेखाएं मेरे माथे में चल रही थी और मेरे इस तसव्वुर में उनके माथे पर चिंतन की सलवटे पड़ रही थी। जी, मैं बात कर रहा हूं अपने स्वयं प्रकाश भइया की। लेकिन आज के स्वयं प्रकाश की नहीं, जो मेरे हर दिल अजीज बड़े भाई बन चुके हैं। मैं बात कर रहा हूं उस स्वयं प्रकाश की, जिन्हें मैं नहीं जानता, लेकिन आज उन्हें देखकर ऐसा लगता है कि जरूर वो ऐसे ही रहे होंगे, ऐसे ही सोचते होंगे, ऐसे ही, ऐसे ही, ऐसे ही..... न जाने कितने ऐसे ही हैं मेरे जेहन में, जो मुझे परेशान भी करते हैं और सुकून भी पहुंचाते हैं, क्योंकि इन ऐसे ही में मेरे स्वयं प्रकाश भइया की यादें तो जुड़ी रहती है, न। शायद कपोल-कल्पित और शायद नहीं. क्योंकि मेरे हिस्से का तो सच यही है.

माथे पर चिंतन की सलवटे लिए स्वंय प्रकाश भइया जब अपनी हाथ में कलम लिए दिमाग को ठकठकाते हुए कोरे कागज पर शब्दों को बार-बार उकेर रहे होगें, तो शुरू में उन्हें भी खुद पर अविश्वास हुआ होगा। बहुत कठिन लगा होगा कि इस विशाल व्यक्तित्व को कैसे कोरे कागज में समेटूं। और शायद उनका वही चिंतन आज के इस ब्रह्मïनाद के कार्यक्रम में उभर कर सामने आ गया। ये मेरी कल्पना है।

1200 सितार वादकों के मधुर तान से आसमान गूंज रहा था। पवित्र यमुना, देशी-विदेशी पक्षियां, सूर्यास्त की लालिमा और देश-विदेश से आए लोग आध्यात्मिक गुरु श्रीश्री रवि शंकर का स्वागत कर रहे थे। कार्यक्रम था ब्रह्मïनाद का. रचा जा रहा था इतिहास. धुन का, सुर का, संगीत का, अनुशासन का और गाए जा रहे थे जीवन के गीत. जगह था नोएडा के सेक्टर -32 का मैदान. इस इतिहास के गवाह बने मेरे जैसे लाखोंं जिज्ञासु. मेरे अंदर सुबह से दो बातों को लेकर कोलाहल मची हुई थी. पहला यह कि इस विहंगम दृश्य का साक्षी बनने को लेकर और दूसरा ये कि स्वयं प्रकाश भइया की किताब जीना सिखा दिया- श्री श्री रवि शंकर- एक जीवनी- के लोकार्पण को लेकर. और, मैं साक्षी बना. ब्रह्मïनाद में पहुंचने के बाद मैं न तो कुछ सोच पा रहा था और न हीं समझ पा रहा था. मैं अपने दायित्वों को निपटा कर सुर-संगीत के संगम में मगन हो गया. मेरे जीवन का यह पहला अवसर था जब मैंने अथाह 'सागरÓ जैसी हिलोरें मारते जनसैलाब को देखा, जो आने वाले क्षण को संजो लेना चाहते थे अपनी आंखों में- और मैं भी, जो चाहता था कि अपने नयन रूपी कंवल को खाली कर लूं, क्योंकि अमृत की बारिश तो अब होने वाली थी- यानी श्री श्री रवि शंकर की जीवनी पर आधारित किताब का लोकार्पण. और यह क्षण मेरे लिए ठीक वैसा ही था-जैसा कि विदेह नगर में श्रीरामचंद्र जी के पधारने से पहले ही सीताजी की सखियां भाव-विभोर हो कर आंसुओं की बारिश कर रही थीं, जिस पर गोस्वामी तुलसीदास जी ने ये पंक्तियां लिखी थी-

सांवर रूप सुधा धरिवे को

नयन कंवल कल कलश रितौरी

मंच से जब-जब उदï्घोषणा होती, मेरी धडक़नें बढऩे लगती. जगह की कमी के कारण मैं और अनुराग भइया (वरिष्ठï पत्रकार) एक ही कुर्सी पर बैठे थे। रात के 8:30 बज रहे होंगे, जब सितारों का बजना शांत हुआ. मंच से आवाज आई - दो साल पहले जब दैनिक भाष्कर के संपादक श्री स्वयं प्रकाश जी आर्ट ऑफ लिविंग के सिल्वर जुवली कार्यक्रम बंगलूर में... हजारों लोगों के बीच मंच पर स्वयं प्रकाश भैया को देखकर एकाएक मेरी आंखों से आंसू छलक गये. मैं खुद को रोक नहीं पाया. क्यों, मुझे मालूम नहीं! हां, इस वक्त सामने खड़ा वही शख्स, मेरी तसव्वुर में भी था. आंखें भी उन्हीं को देख रही थी और भीतर की आवाज भी उन्हीं को सुन रही थी- उनकी यह बात जो अक्सरहां मुझसे कहा करते थे- बाबू! भावनाओं की कोई भाषा नहीं होती. मेरे दिमाग को यह बात बार-बार झकझोर रही थी.

सनï् 2005 की बात रही होगी. मैं स्नातक के बाद पत्रकारिता को जानने-समझने के लिए दिल्ली चला आया. प्रभात खबर के कार्यालय में मेरी मुलाकात अंजनी कुमार सिंह (अब प्रभात खबर के दिल्ली ब्यूरो प्रमुख) से हुई. वे मुझे छोटे भाई जैसा मानते हैं. चर्चा के दौरान स्वयं प्रकाश भइया के बारे में बताया और उनका नम्बर दिया. लेकिन हमने इसे बहुत हल्के में लिया और बात नहीं की, पर संयोगवश मैं जहां भी जाता था, उनकी बात निकल ही आती थी. और, अब मुझे उनसे न मिलने का मलाल भी होने लगा.मैं दिल्ली से वापस अपने गांव चला आया. उसके कुछ दिनों बाद 'हिन्दी दैनिक आजÓ पटना में काम करने का अवसर मिला. आज अखबार में कुमार निशांत जी (वर्तमान में छिंदवाडा में कार्यकारी संपादक) से मित्रता हुई। पर कुमार निशांत जी कुछ दिन में मेरे बड़े भाई बन गये। एक रोज मै निशांत भइया से स्वयं प्रकाश जी कि चर्चा की और बड़े चाव से उनको ये बताया कि ये दैनिक भाष्कर के संपादक हैं. उसके बाद निशांत भइया कुछ चिढ़ाने वाले अंदाज में बड़े अपनेपन से हमेशा हमसे पूछने लगे- तब होऽ जेपी तोहार दैनिक भाष्कर के संपादक स्वंय प्रकाश जी के का हाल बा. जबकि मैं हर बातचीत में ये बताया करता था- उन्हें जानता नहीं, लेकिन उनके बारे में सुन बहुत रखा है.

उसी दरमियान हम और निशांत भैया दोनों नौकरी छोड़ कर दिल्ली चले आये. हम दोनों दिल्ली का चक्कर काटते रहते थे. मैं दिल्ली का रास्ता बताता और निशांत भइया जगह. रोज की तरह हम लोग 14 अक्टूबर 2007 को आईएनएस के आसपास घूम रहे थे. निशांत भैया बोले जेपी, पालम चलना है और पालम जाने को लेकर जबरदस्त रहस्य बना रखा था. मेरे लाख पूछने पर भी उन्होंने ये नहीं बताया कि किसलिए? वहां पहुंचने पर एक घर में हम लोग गये. वहां निशांत भइया ने कई लोगों के पांव छूए और उनका अनुसरण मैं करता गया. मै भी ठीक उनके-उनके पांव छू लेता, जिनके-जिनके वो छूते जाते. थोड़ी देर में गंजी और पायजामा पहने गोरा-चिट्टïा जवान, मध्यम कदकाठी और अधपके बाल वाले सज्जन वहां हाथ में ढेरो अखबार लेकर अंदर के कमरे से निकल कर आए. निशांत भइया का अनुसरण करते हुए मैंने उनका भी पांव छू लिया. पता चला कि...
जारी...

3 comments:

प्रमोद कुमार तिवारी said...

Barhia lagal ho JP. Roj likhal kara.

Unknown said...

Bahut dhardar abhibyakti hai. koi shak nahi. samvedna ki aseemeet udan.

रौशनाई said...

jp इस में कोई दो राय नहीं की बहुत ही उम्मदा लिखते हैं पर मेरे जैसो के लिए थोड़ा कठीन था....शब्दों को बहुत ही सोच सझम कर इस्तेमाल किया गया है...इस को पढ़ कर लगा आप बहुत ही भावुक व्यक्ति हैं....खुदा करे आप की क़लम और चमके....बहुत ही अच्छा लिखते हैं....